नई सहस्राब्दि में भारत का नियति से अगला महामिलन तय है। इक्कीसवीं सदी का अर्थ है सभी जगह लोगों में नई आशाएं और नई आकांक्षाएं। भारत के लिए बीसवीं सदी का भारी महत्व था। इस सदी में हमने अपने लोगों और देश को उपनिवेशवाद के शिकंजे से आजाद करवाया। उस उपनिवेशवाद के शिकंजे से जिसने न सिर्फ भारत की समृद्धि लूटी, बल्कि हमारी आजादी को भी तार-तार कर दिया। आजादी के साथ हमने सोचा था कि देश की आत्मा और लोगों की मेधा शोषण व दासता से आजाद हो चुकी है और हम अब खुद अपनी नियति के मालिक हैं। यह बहुत मेहनत से कमाई गई आजादी थी। आजादी के वक्त भारत ने अपने लोगों से जो वायदे किए थे, वे अब भी पूरे नहीं हुए हैं।
मैं जीवन की शुरुआत में ही राजनीति में आ गया था। मैंने अपने राजनीतिक दर्शन के रूप में मार्क्सवाद और वैज्ञानिक समाजवाद को चुना। मैं जीवनभर इन्हीं सिद्धांतों का अनुसरण करता रहा। इसलिए इक्कीसवीं सदी का मेरा विजन बीसवीं सदी के मेरे अनुभवों, सफलताओं और विफलताओं से प्रभावित है। मैं 1935 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गया। उन दिनों जवाहरलाल नेहरू हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हुआ करते थे। मार्क्सवाद और वामपंथी राजनीति में मेरी दिलचस्पी की वजह से मैं इंग्लैंड में इंडिया लीग, लंदन मजलिस और स्टूडेंट फेडरेशन जैसे प्रगतिशील राजनीतिक मंचों से जुड़ गया जो भारत की स्वतंत्रता के लिए जनमत जुटाने का काम करते थे। नेहरू ने इन सभी संस्थाओं को समर्थन दिया।
सामाजिक और आर्थिक तंगी दूर करने के लिए नेहरू मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा पर चलना चाहते थे। हकीकत यह है कि सामंती पूंजीवादी व्यवस्था आज भी कायम है। अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत होती तो इस तरीके से भी काफी कुछ किया जा सकता था, लेकिन भूमि सुधार और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण न होने से सत्ता और समृद्धि मुट्ठीभर लोगों तक सीमित हो गई है। नौकरशाही मजबूत हुई और फूली-फली, जबकि आम लोग गरीबी से बेजार हैं। भारत की राजनीति में राजनीतिक केंद्रवाद के चिंताजनक संकेत दिखाई देते हैं। केंद्र सरकार की अधिनायकवादी प्रवृत्तियों की इंतहा 1975 में आपातकाल के रूप में सामने आई, जब भारत के नागरिकों को संविधान में सुशोभित बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया गया।
भारत की लोकतांत्रिक परंपरा में अधिनायकवाद और आपातकाल को खारिज करके अपने को दुबारा स्थापित किया। वर्षो बाद मैंने श्रीमती इंदिरा गांधी से पूछा था कि उन्होंने ऐसा अलोकतांत्रिक और उग्र कदम क्यों उठाया। उनका जवाब था कि देश तहस-नहस होने की कगार पर था और लोग सरकार की सलाह मानने को तैयार नहीं थे। उन्हें लगा कि लोगों को सही रास्ते पर लाने के लिए शॉक थैरेपी जरूरी थी। आजादी के बाद ज्यादातर सालों तक सत्ता पर एकाधिकार के बावजूद कांग्रेस पार्टी धार्मिक कट्टरता और फिरकापरस्ती का मुकाबला करने में नाकाम रही।
चीजों को नए सिरे से देखने और आने वाले समय के लिए अपने को तैयार करने की जरूरत आज बहुत तीव्र हो गई है। मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि केंद्र को बहुत से वित्तीय व अन्य अधिकार राज्यों को सौंप देने चाहिए। शासन व्यवस्था को और लोकतांत्रिक बनाते हुए ठेठ गांवों तक ले जाने में भी मेरा गहरा विश्वास है। ऐसी शासन व्यवस्था का विकास करने की जरूरत है जो सच्चे अर्थो में फेडरल या संघीय हो। मजबूत केंद्र के लिए मजबूत राज्यों का होना भी जरूरी है। लेकिन फेडरल होने का अर्थ छोटे-छोटे राज्यों का निर्माण नहीं है।
यह एक राजनीतिक हथियार है, जिसका इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी अपने समर्थन आधार के निर्माण के लिए कर रही है। जरूरत इस बात की है कि जहां जरूरी हो, राज्य के भीतर ही ज्यादा स्वायत्तता दी जाए। भारत में संपूर्ण नागरिक समाज का निर्माण नहीं हो पाने के कारण हमारे राजनीतिक लोकतंत्र का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जातिवादी और धार्मिक वोटबैंकों का निर्माण, धन का इस्तेमाल, उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार, बाहुबल और अपराधी-राजनीतिक सांठ-गांठ हमारी प्रमुख सामाजिक राजनीतिक बुराइयां हैं, जिनसे सभी सही सोच वाले लोग चिंतित हैं।
यह सही है कि भारत वैश्विक रुझानों से अलग-थलग नहीं रह सकता। यह भी सच्चई है कि १९९१ में देश ने बिना किसी तैयारी के आर्थिक उदारीकरण को अपना लिया। कमजोर, गरीबों और औद्योगिक मजदूरों को व्यापक सुरक्षा तंत्र न होने की कीमत अदा करनी पड़ी। नियोजित विकास के रास्ते पर चलते रहना होगा, लेकिन हमें अपनी प्राथमिकताएं अपने अनुभवों के आधार पर नए सिरे से तय करनी होंगी। सर्वानुमति बनाने के लिए विचार-विमर्श और आत्मावलोकन जरूरी होगा।
अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन करते हुए शिखर के मुट्ठीभर लोगों के बजाय करोड़ों आम लोगों की हालत को कसौटी बनाना होगा। मैं महसूस करता हूं कि देश में मौजूदा प्रणाली जारी रहेगी, लेकिन अगर इसी प्रणाली में नकारात्मक बातों को दूर किया जा सके तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। हमें विदेशों से निवेश और विकसित देशों से टेक्नोलॉजी का स्वागत करना चाहिए, लेकिन साथ ही पिछले कई दशकों में खासकर साइंस एवं टेक्नोलॉजी में भारत की उपलब्धियों को खारिज नहीं किया जा सकता। हमें अपने मेधावी वैज्ञानिकों, तकनीकीविदों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और हुनरमंद लोगों को संसाधन और अवसर उपलब्ध करवाने होंगे ताकि वे भारत को आगे ले जा सकें। हमें अपने आप में विश्वास नहीं खोना चाहिए और आत्मनिर्भरता हासिल करने की ओर बढ़ते रहना चाहिए।
मुझे यकीन है कि इक्कीसवीं सदी के वर्ष ज्यों-ज्यों बीतेंगे, दुनिया वैश्वीकरण के बुरे प्रभावों के बारे में ज्यादा जागरूक होती जाएगी। हालांकि दुनिया के बहुध्रुवीय होते जाने के साथ हमें आखिरकार वैश्वीकरण और परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की नई विश्व व्यवस्था के हिसाब से अपने को ढालना होगा।
मार्क्सवादी होने के नाते मेरी दिलचस्पी दुनिया को केवल समझने में नहीं, बल्कि उसे बदलने में भी है। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि पूंजीवाद मानव सभ्यता की अंतिम व्यवस्था नहीं है। नई सदी में हम समाजवादी, शोषणविहीन और मानवीय समाज का अभ्युदय देखना चाहेंगे जो साम्यवादी समाज की पहली अवस्था है। हम जिस समाजवादी समाज का सपना देखते हैं, वह सिर्फ आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाकर नहीं रुकता, बल्कि एक नए मनुष्य और उच्चतर सभ्यता की स्थापना करना चाहता है जहां सभी मनुष्यों में आपस में प्रेम और सद्भाव होगा। हम एक ऐसी दुनिया की उम्मीद करें जहां छोटे या बड़े युद्ध की कोई जगह नहीं होगी, विवाद बातचीत से निपटाए जाएंगे और देशों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व होगा।
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