Thursday, February 28, 2013

दिल्ली के वोट बैंक लुभाने कि कोशिश ?


आम बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का दायरा बढाया गया हैं। इससे, पूरे देश के लोवर मिडल क्लास को लुभाने कि कोशिश की गई हैं। जिसमें जिसमें रिक्सा, ऑटो रिक्सा ड्राइवर टैक्सी ड्राइवर, सफाई कर्मचारी और कूड़ा उठाने वाले गरीब लोगो को भी इस योजना में शामिल किया हैं।
      दिल्ली शहर में ऐसे बहुत से लोग, देश के अलग-अलग कोने से आए हैं। उन्हे अपनी जीविका चलाने के लिए जो कार्य मिला उन्होने वही किया। दिल्ली में रिक्सा, ऑटो रिक्सा ड्राइवर टैक्सी ड्राइवर, सफाई कर्मचारी और कूड़ा उठाने वालों भी रहते हैं। तो हर कोई उन्हे लुभाने की कोशिश कर रहा हैं। क्योकि दिल्ली में इसी साल विधानसभा के चुनाव हैं। और गौरतलब यह हैं पिछले कुछ महिने पहले और एक साल पहले दिल्ली के ऑटो रिक्शा वाले हड़ताल पर चले गए थे। जिस कारण कहीं न कहीं इनमें, कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा दिखाई पड़ता था। तो उन्हे लुभाने के लिए केन्द्र सरकार ने यह कदम उठाया हैं। क्योकी दिल्ली में आने की ख्वाहिश सभी पार्टियो कि रहती हैं। तो क्या यह बजट उन लोगो को लुभाने की कोशिश की जा रही हैं? ताकि कांग्रेस आने वाले विधान सभा के चुनाव में जीत हासिल कर सके। इस तहर के कयास पहले ही लगाए जा रहे थे। कि क्या आम बजट अर्थव्यवस्था को साधने के लिए तैयार किया जाएगा या फिर अगले साल होने वाले आम चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया जाऐगा। तो इस बजट को देखकर तो यही लगता हैं यह एक लोक लुभावन होने के साथ साथ अर्थव्यवस्था को सभालने की कोशिश भी की गई हैं ।

Wednesday, January 9, 2013


वो जीना चाहती थी मगर ऐसा हो व सका ।
वो कुछ बनना चारती थी , मगर ऐसा हो न सका ।
16 दिसम्बर को गैंग रेप की घटना ने इंसानियत को शर्मशार कर दिया, ऐसा पहली बार नही हुआ। राजधानी दिल्ली में ही नही, बल्कि देश के हर कोने में अक्सर ये घटनाएं होती रहती हैं। दिल्ली में लगभग एक महिने में 700 बलात्कार के मामले प्रकाश में आते हैं और देश के कोने-कोने में इस तरह के न जाने कितने मामले सामने आते हैं मगर यह आकड़ा है जिनकी शिकायत दर्ज कराई  गई । ऐसे न जाने कितने मामले ऐसे है जो प्रकाश में नहीं आते हैं इसके कई कारण हैं जिनमें से बढ़ा कारण हैं समाज । क्या समाज का नज़रिया ही इन घटनाओ का एक बड़ा कारण हैं ?
            आज समाज के कुछ लोग महिलाओ को सेक्स आब्जेट के रूप में देखते हैं। क्या यह सब कढ़े कानून बनाकर कर बदला जा सकता है? अब समाज धैर्य और तार्किकता के साथ फैसला कर रहा हैं अब वह बलात्कार की सजा, फांसी की मांग को दरकिनार करते हुए पूरे समाज के मांइड सैट को बदलना चाहता हैं। क्योकी वह जानता हैं कि सिर्फ फांसी की सजा से ये चीजे नही बदलेगी। जिसका एक उदारपण हैं, दहेज को लेकर कड़ा कानून, जिसके बनने के इतने साल बाद भी अब तक दहेज प्रथा हमारे समाज में मौजूद हैं। इसे दूर करने के लिए जरुरत हैं जागरुकता की। इसी तरह अश्लील फब्तिया छेजडखानी और बलात्कारी जैसी समस्याओ से निजात पाने के लिए जरुरत है सामाजिक जागरुकता और ऐसे लोगो की हिम्मत को बढावा देने वालो पर लगाम कसने की।
जे.एन.यु. के प्रोफेसर आनंद कुमार का कहना कि इसे बदलने के लिए हमें अपनी युवा पीड़ी और स्कूलो से शुरुआत करनी चाहिए जहां महिलाओ को बराबरी का दर्जा दिया जाए और उनकी मौजुदगी को बढ़ाया जाए।
      समाज में लिंग भेद की जो अवधारणा हैं वह अभी हाल ही में नहीं पनपी हैं। लिंग भेद- भाव करनें में पुरुष समाज ही नही बल्कि महिलाओ का दोष देखा गया हैं जैसे लड़के के जन्म होते ही दाई थाली बजाती और लड़की पर ऐसा कुछ देखने को नही मिलता हैं। इसके लिए सिर्फ पुरुष ही दोषी नहीं, कहीं न कहीं महिलाए भी दोषी हैं।
गोंगा जो एक अध्यापिका हैं उन्होने कहा की समाज को बदलने के लिए कढ़े कानून के साथ-साथ समाजिक जागरुकता बेहद ज़रुरी हैं।
      कढ़े कानून बनाने के साथ-साथ महिला के प्रति समाज को जागरुक करना ज़रुरी हैं क्योकी किसी की हत्या करने पर कानूनी सजा फांसी तक हो सकती हैं फिर भी आए दिन हत्याए हो रही हैं। सिर्फ कानून बनाने से महिलाओ को सुरक्षा प्रदान नही की जा सकती हैं बल्की समाज को उनके प्रति जागरुक करके ये घटनाए कम की जा सकती हैं । 
                                                             

Thursday, December 6, 2012

सरकारी अस्पतालो में लापरवाही कोई आम बात नहीं हैं।

दिल्ली के सरकारी अस्पतालो में लापरवाही एक आम बात नज़र आती हैं जिसको हाल ही में पांच लोगो ने अपनी जान गवाकर साबित कर दिया सरकारी अस्पतालो में लापरवाही उन सभी लोगों ने दोखी जो  लोग सरकारी अस्पतालो में जा चुके हैं दिल्ली सरकार ने पिछलो दिनो बहुत से कार्यक्रम आयोजिक कराए। कहीं तुगलक कहीं म्युचिक फेस्टिवल वगैराह वगैराह।

                  इनके उद्घाटन के लिए दिल्ली के बढ़े बढ़े नेता पहुचे मगर कभी-भी शीला सरकार का कोई नुमाइंदा इन सरकारी अस्पतालो में हो रही लारपवाही की जांच करने पहुचा ? कभी सरकार ने देखने की कोशिश की जो लोग आक्सीजन प्लांट में ठेकेदारी प्रथा के अन्दर कार्य कर रहें हैं वे इस योग्य हैं कि वह इसका संचालन टीक ढ़ग से कर पा रहे हैं या नही ।

                  उत्तर -पुर्वी दिल्ली में गुरू तेग बहादुर अस्पताल(जीटीबी) में देखने पर भी ऐसे मामले हैं जैसे इंमरजेंसी लेबर रुम के  बाहर बैठने की जगाह नही हैं। जिससे लोगो को खासी परेशानी का सामना करना पढ़ता हैं टीक इसी रूम के सामने सिक्योरिटी ड्युदी रूम हैं जिसमें उतनी कुर्सिया हैं जिन पर बैठने वाने की कमी हैं, तो प्रशासन को इन कुर्सियो को मरीज के अटैन्डेंट के लिए बाहर नही रख  देना चाहिए? ताकि वह अटैन्डेट बैट सके ।
  पूरे अस्पताल की बिल्डिंग के अंदर पीने का पानी तो ढूढ़ना जैसे खेत में सुई ढूढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल हैं क्या कभी सीमापुरी विधानसभा के विधायक जो जीटीबी अस्पताल की सलाहकार कमेटी में हैं उन्होने इस समस्या को कम  करने कोशिश की हैं ?  वोटर को लुभाने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमो के साथ- साथ मुल-भूत जरुरतो भी हैं जैसे अस्पतामो में अच्छी सुविधाए  भी बहुत जरुरी हैं ।

Friday, October 12, 2012


मंहगाई  हाय ये महगाई

 पिछले दिनो डीजल के दाम में बढोत्तरी व साल में सिर्फ 6 घरेलू गऐस सिलेडर पर सब्सिडी मिलेगे। इन चीजो पर भी पड़ रहा है . इससे कारोबारी , दुकान दार, सब्जी बेचने वाले और छात्र, सभी की ज़दगी प्रभावित हो रही है
       देश व राजधानी दिल्ली में बीते कुछ महिनो से मंहगाई को मानो पर लग गअ हो मंगाई आसमान छूती जा  रही जिसने सभी वर्ग के लोगो को प्रभावित किया है जिस आलूकी कीमत लगभग दुगनी हो कर 20 हो गई हैं मुनिरका में रहने वाले छात्र रवेन्द्र ने बताया की लगातार मंहगाई बढ़ने से घर से ज्यादा पैसे मांगवाने पढ़ते है मगर पापा की तनख्वाह तो अभी उतनी ही हैं उनकी आय तो भढ़ नही मगर महगाई जरूर बढ़ी अक और छात्र ने कहा की कहम अपनी रोजमर्रा की जीचो में कमी भी कर रहे हैं , क्योकी घर को पैसा तय सीमे में ही आता हैं
नरेन्द्र का कहना है की घर से फोन आता हैं की बेटा कम से कम एक दूध पी लिया कर मगर महगाई देखे तो चाय से पहले सेजना पड़ता हैं
  
सरकार लगातार तर्क दे रही हैं की आमदनी में बढ़ी हैं पिछले दिसम्बर के बाद अभी तक तनख्वाह में बढ़ोत्तरी नही हुई हैं मुनिरका में दुकानदार ने बताया मंहगाई के कारण लोग अपनी जरुरत ता चीजो में कटौती कर रहे हैं पहले स्टूडेंस आते आते खे अच्छी –अच्छी और मंहगी शर्ट , टी शर्ट खरीदते थे अब ग्राहक भी कम हो गए है स और जो आते हैं को भी सस्ते कपड़े मांगते हैं
दुकान में एक ग्रारक ने बताया की  हम खरीदे तो जब , पैसे अन्य जरूरी वस्तुऔ को खरीदने में थर्च हो जातो हो जाते है तो महगे कपड़े कैसे खरीदे और मुख्यमंत्री जी का कहना  कि दुल्ली में रईश लोंग रहते हैं।
चाय बेचमे वाले पामाथार ने भताया की  हम घरेलू गैस का इस्तमाल बचा बचा कर करते हैं ताकी हम गैस का इस्तमालअपनी दुकान के लिए करतै हैं क्योकी गैस किलेडर के दाम बढ़ने से हमारी लागत ज्यादा आ रही हैं और अगर हम चाय के गाम बढ़ देते हैं दो ग्रारक कम हो जोते हैं तो मुझे समझ नही आ रहा की खया करू वच्चो को पढ़ना भी हैं सब कुछ करना अब नुश्किल नड़र आने लगा हैं
       उत्तर भारत की महिला जो शाम के वक्तसब्जिया बेचती है वो कहती है की सब्जिया बेचती है बो कहती है की सब्जियो के दाम बढ़ सए ग्राहक ग्राहक ज्यादा दामे में लेता नही और लागत कि कीमत के बराबर बेचते हैं अब घर में 9 सदस्य है तो उनका पालन पोषण किए करह सो होगा  समझ मही आता कभी दाल रोटी खाते थे मभ जटनी चावल के गुजारा चलाना पढ़ रहा हैं सरकार कई बार आर्थिक नीती का हवाला देती नज़र आती हैं मगर इन लोगो की आर्थिक हालत पर कौन ध्यान देंगा
       वुजशाद गार्डन निवासी अनिल नारायण ने कहा की सरकार कन तक यू ही आर्थिक विकास का हवाला देकर हमारी थाली में से खाना कम करती रहेगी सरकार सांसद की सब्सिडी कम करने की बात क्यों नही करती हैं । सरकार लगातार मंहगाई दर को कम करने की कोशिस कर रही हैं और लोन की ब्याज दरो में कटौती कर रही हैं
       किशोर पेशे से छोले भटूरे बेजते हैं उन्होने कहा की अब प्याज, मसाले और अन्य चीजो के दाम बढ़े हैं और मुनाफा बहुत घटा हैं और घर में पांच वच्चे हैं और पांचो पढ़ रहे हैं, बढ़ा बेटा सी.ए. बनना चाहता हैं अब कहां हैं इतना रुपया ।
मनमोहन ने कहा था इकॉनमिक ग्रोथ को रफ्तार देने और भारत में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए कैबिनेट ने कई फैसले लिए हैं ष इससे मुश्किल हालात में भी हमारी तरक्की की प्रक्रिया मजबूस होगी और रोजगार बढ़ेगा ।
 दिल्ली की सीमा पुरी में रहने वाले एक आदमी जो कूड़ा उटाता उसने कहा की हमें तो समझ नही आता की शाम को अपने परिवार का पेठ पालने के रूपया कहा से आएगा ,सुबह उठते तो इ अस से, की आज अपने परिवार का हेट फर जास और में सरकार से नही , रोटी से मतलब हैं 

Wednesday, January 19, 2011

हिला उत्तर भारत........


  
नई दिल्ली. पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम इलाके में कल देर रात आए भीषण भूकंप ने भारत समेत एशिया के कई देशों को हिलाकर रख दिया है। भूकंप आज भी ऐसा प्रलय माना जाता है जिसे रोकने या काफी समय पहले सूचना देने की कोई प्रणाली वैज्ञानिकों के पास नहीं है। प्रकृति के इस तांडव के आगे सभी बेबश हो जाते हैं। सामने होता है तो बस तबाही का ऐसा मंजर जिससे उबरना आसान नहीं होता है।
क्वेटा का इतिहास भी वर्ष 1935 में एक ऐसा भूकंप देख चुका है जिसने क्वेटा को लगभग पूरी तरह से तबाह कर दिया था। वर्ष 1935 में आए भूकंप में 30 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील पाकिस्तान और भारत के उत्तरी हिस्सों में इस चुनौती से निपटने की तैयारियों को लेकर हमेशा चिंता व्यक्त की जाती रही है।कई विश्लेषकों और संगठनों का मानना है कि सरकारों का रुख आपदाओं से निपटने के प्रति बेहद गंभीरता लिए हुए नहीं रहा है।
आइए डालते हैं  एक नजर...भीषण भूकंप पर!

12
जनवरी 2010: कैरेबियाई देश हैती में आए शक्तिशाली भूकंप में एक लाख से अधिक लोगों की मौत। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.3 आंकी गई थी।
अक्टूबर 2009: इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में आए भूकंप में 500 से अधिक लोग मारे गए।

02
फरवरी 2008 : चीन के सिचुआन प्रांत में आए भूकंप से हुई भारी तबाही में करीब 15 हजार लोग मारे गए और हजारों जख्मी हुए।

27
मई, 2006 : इंडोनेशिया के जकार्ता में आए भूकंप में छह हजार लोग मारे गए और 15 लाख बेघर हो गए।

08
अक्तूबर, 2005 : पाकिस्तान में 7.6 तीव्रता वाला भीषण भूकंप आया जिसमें करीब 75 हजार लोग मारे गए। करीब 35 लाख लोग बेघर हुए। इस भूकंप के झटके भारत में भी महसूस किए गए।

26
जनवरी 2001: भारत के गुजरात में रिक्टर पैमाने पर 7.9 तीव्रता का एक शक्तिशाली भूकंप आया। इसमें कम से कम 30 हजार लोग मारे गए और करीब 10 लाख लोग बेघर हो गए। भुज और अहमदाबाद पर भूकंप का सबसे अधिक असर पड़ा।

29
मार्च 1999: भारत के उत्तरकाशी और चमोली में दो भूकंप आए और इनमें 100 से अधिक लोग मारे गए।

30 सितंबर 1993: भारत के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में आए भूकंपों में क़रीब दस हजार लोगों की मृत्यु हो गई।

Monday, January 17, 2011

फले से ही बनी ६ लेन की सड़क को दोबारा से ६ लेन बनाया जा रहा है लगत इसमें १०९ करोड़ के आएगी पर समय कितना लगेगा पता नहीं क्योकि एक साल पहले शुरू हुआ काम अभी भी जारी है हलाकि यह मामला है मैहरोली से गुडगाव का है मगर यह पुरे देश के हायवे के निर्माण का नज़ारा बयां करता है
   मजे के बात तो यह है की जब रास्ट्री राज मार्ग ने इस रोड का टेंडर निकला था तब डेल्ही मेट्रो इस पर ६ लेन का कम पूरा कर रही थी जब इसकी लगत लगभग ८ करोड़ आई थी तब इस रोड को बनाने में साये लगा था सिर्फ ८ महीने DMRC ने अभी अपना कम ख़त्म भी नहीं किया था की 19 फरवरी को इस इस रोड को नेशनल हिव्य का नाम दे दिया गया लेकिन ६ लेन, इसके साथ सड़क के किनारे फुटपाथ और साइकिल ट्रैक बनाने  के के लिये  टेंडर जन. में ही बुला ले लिए गए थे मगर इस सड़क के किनारे पेइवाहन मंत्री कमलनाथ जैसे मुल्क के  असरदार लोगो के फर्म्हौसे है तो इस वजह से इस कार्य में देरी हो रही है
लेकिन सवाल यह उठते है के.......?

कार्do  का खर्चा लेकिन न ओडिट न ही रेगुलेट

पूर्व केंद्रइए परिवहन  मंत्री सचिवे और N H A I के पूर्व चिएर्में योगेंदर नारायण के मुताबिक हिव्य सेक्टर को C A G और सूचना के मुताबिक होना चैये इस चेत्र में विशेषज्ञों की तीन सदस्यी स्वंतंत्र रेग्युल्त्री ओउथोरिटी के ज़रोरत है

केन्द्र्ये सड़क परिवहन मनरी और राजमार्ग मंत्री कमलनाथ ने बताया की हिव्य का कम अभी तक ठाप पड़ा था अभी तक हिएय को लेकर न तो कोई योजना थी, न दाद्लिने , न टार्गेट और न ही कम के अवार्ड ही है इस साल भी लक्ष्य १० हजार किलोमीटर कम देने का है आपको जल्द ही नतीजे दिखने लगेगे
इन्गीन्यर और ठेकेदारों की मिलीभगत
न्मंराल्ये व N A इके इंजीनयर की कन्सलटेंट और ठेदारो के साथ गहरी साथ्गत है इस्ससे हिघ्वय के काम में देरी व भ्रष्टाचार  फैल रहा है:- ब्रह्मा  दत्त पूर्व  केंद्रीय परिवहन सचिव का सड़क परिवहन पर बनी संसदिये समिति के बयां 

20 की जगह 5 किलोमीटर प्रतिदिन के हिसाब से हो रहा है
हिघ्वय ओउथोरिटी और इंडिया ने पाच वर्सो में ३५ किलोमीटर राजमार्ग नैरमं का लक्ष्य रखा थाई हर दिन २० किलोमीटर लेकिन फिलहाल ५ किलोमीटर प्रतीदिन का निरमं हो रहा है
मिठाक
१. कोई इन्फ्रास्त्त्कचार चेत्र में पैसे नहीं लगाना चाहता है क्योकि यह लाभ का सौदा नहीं है
२. सड़क बनाने जैसे विकाशील चीजो में [ऐसा डूबता जा रहा है
हकीकत
१. जूच कम्पनी साथ - आत साल में अरब पति हो गए कोयोकी रेट और फेत्र्ण ९० %है
२. हिघ्वय पर टोक और सेस के जरिये १० हजार करोर्ड से ज्यादा की कमई |

Sunday, January 16, 2011

सरकारी स्कूल क्यों नहीं

दिल्ली में नर्सरी दाखिले की प्रक्रिया चल रही है और ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला किसी निजी स्कूल में कराना चाहते हैं। वे दिल्ली नगर निगम या सरकारी स्कूलों की ओर देखना तक नहीं चाहते। ऐसा नहीं है कि अभिभावकों की इस बेरुखी की वजह से दिल्ली सरकार या एमसीडी वाकिफ नहीं हैं। दोनों सरकारी एजेंसियां जानती हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में संसाधनों की कमी ही वे कारण हैं, जिनकी वजह से ज्यादातर अभिभावक सरकारी स्कूलों से विमुख हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ये दोनों एजेंसियां इस बात को लेकर जरा सा भी चिंतित नहीं हैं और स्कूलों में संसाधनों की कमी दूर करने व शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए कोई उल्लेखनीय प्रयास होते नहीं दिखाई दे रहे हैं। इसी सरकारी लापरवाही का नतीजा सोमवार को पश्चिमी दिल्ली के एक एमसीडी स्कूल में दिखाई दिया। वहां बिजली-पानी, डेस्क, इत्यादि न होने के कारण तमाम समस्याओं के बीच पढ़ने को मजबूर छात्र-छात्राओं ने मोमबत्ती व पोस्टर हाथों में लेकर स्कूल प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रोष जाहिर किया। इन छात्रों ने न सिर्फ अपनी परेशानी बयां की, बल्कि निगम स्कूलों की तस्वीर भी सबके सामने उजागर कर दी।
जहां सरकार ने शिक्षा के अधिकार को लेकर कानून बना दिया हो, वहां सरकारी स्कूल के छात्रों का पढ़ाई छोड़कर समस्याएं दूर करने की गुहार लगाना निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है। और यह स्थिति यदि राजधानी के ही सरकारी स्कूलों की हो, तो फिर कहने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि जब राजधानी के सरकारी स्कूलों का यह हाल है तो देश के दूरदराज के इलाकों की स्थिति क्या होगी? शिक्षा के अधिकार का सही अर्थो में लाभ तभी हो सकता है, जब स्कूलों में संसाधनों की कमी न हो और छात्रों को गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त हो। इसके लिए सरकारी स्कूलों को अपने तौर-तरीके में बदलाव करना होगा। निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए भी दिल्ली सरकार और एमसीडी को अपने स्कूलों की स्थिति में सुधार करना चाहिए। अभिभावकों को जब तक निजी स्कूलों के स्तर का सरकारी विकल्प नहीं मुहैया कराया जाएगा, तब तक न तो निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लग पाएगी और न ही सही अर्थो में शिक्षा के अधिकार का लाभ मिल पाएगा।