Wednesday, January 9, 2013


वो जीना चाहती थी मगर ऐसा हो व सका ।
वो कुछ बनना चारती थी , मगर ऐसा हो न सका ।
16 दिसम्बर को गैंग रेप की घटना ने इंसानियत को शर्मशार कर दिया, ऐसा पहली बार नही हुआ। राजधानी दिल्ली में ही नही, बल्कि देश के हर कोने में अक्सर ये घटनाएं होती रहती हैं। दिल्ली में लगभग एक महिने में 700 बलात्कार के मामले प्रकाश में आते हैं और देश के कोने-कोने में इस तरह के न जाने कितने मामले सामने आते हैं मगर यह आकड़ा है जिनकी शिकायत दर्ज कराई  गई । ऐसे न जाने कितने मामले ऐसे है जो प्रकाश में नहीं आते हैं इसके कई कारण हैं जिनमें से बढ़ा कारण हैं समाज । क्या समाज का नज़रिया ही इन घटनाओ का एक बड़ा कारण हैं ?
            आज समाज के कुछ लोग महिलाओ को सेक्स आब्जेट के रूप में देखते हैं। क्या यह सब कढ़े कानून बनाकर कर बदला जा सकता है? अब समाज धैर्य और तार्किकता के साथ फैसला कर रहा हैं अब वह बलात्कार की सजा, फांसी की मांग को दरकिनार करते हुए पूरे समाज के मांइड सैट को बदलना चाहता हैं। क्योकी वह जानता हैं कि सिर्फ फांसी की सजा से ये चीजे नही बदलेगी। जिसका एक उदारपण हैं, दहेज को लेकर कड़ा कानून, जिसके बनने के इतने साल बाद भी अब तक दहेज प्रथा हमारे समाज में मौजूद हैं। इसे दूर करने के लिए जरुरत हैं जागरुकता की। इसी तरह अश्लील फब्तिया छेजडखानी और बलात्कारी जैसी समस्याओ से निजात पाने के लिए जरुरत है सामाजिक जागरुकता और ऐसे लोगो की हिम्मत को बढावा देने वालो पर लगाम कसने की।
जे.एन.यु. के प्रोफेसर आनंद कुमार का कहना कि इसे बदलने के लिए हमें अपनी युवा पीड़ी और स्कूलो से शुरुआत करनी चाहिए जहां महिलाओ को बराबरी का दर्जा दिया जाए और उनकी मौजुदगी को बढ़ाया जाए।
      समाज में लिंग भेद की जो अवधारणा हैं वह अभी हाल ही में नहीं पनपी हैं। लिंग भेद- भाव करनें में पुरुष समाज ही नही बल्कि महिलाओ का दोष देखा गया हैं जैसे लड़के के जन्म होते ही दाई थाली बजाती और लड़की पर ऐसा कुछ देखने को नही मिलता हैं। इसके लिए सिर्फ पुरुष ही दोषी नहीं, कहीं न कहीं महिलाए भी दोषी हैं।
गोंगा जो एक अध्यापिका हैं उन्होने कहा की समाज को बदलने के लिए कढ़े कानून के साथ-साथ समाजिक जागरुकता बेहद ज़रुरी हैं।
      कढ़े कानून बनाने के साथ-साथ महिला के प्रति समाज को जागरुक करना ज़रुरी हैं क्योकी किसी की हत्या करने पर कानूनी सजा फांसी तक हो सकती हैं फिर भी आए दिन हत्याए हो रही हैं। सिर्फ कानून बनाने से महिलाओ को सुरक्षा प्रदान नही की जा सकती हैं बल्की समाज को उनके प्रति जागरुक करके ये घटनाए कम की जा सकती हैं । 
                                                             

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